IOS के अधिवेशन में बोले पूर्व चीफ जस्टिस जेएस खेहर- आज़ादी के 70 साल बाद पिछड़ों को रिजर्वेशन क्यों नहीं? जौवाद हसन

नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आज से इंस्टिट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज के द्वारा कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में शानदार अधिवेशन शुरू हो गया, तीन दिवसीय इस प्रोग्राम में  देश विदेश के प्रख्यात लेखक, विचारक और शोधकर्ता शामिल हो रहे हैं। आज के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जगदीश सिंह खेहर ने कहा कि मानव एक जैसे नही होते उनमें अलग अलग कार्य करने की क्षमता होती है। उनमे से कुछ लोग एक दूसरे से बेहतर दिखते हैं, तो कुछ लोग ज्ञानी और बुद्धिमान होते हैं, और यही लोग आगे चल कर बुद्धिजीवी बनकर समाज में समांतर लाने की कोशिश करते हैं। खेहर ने आगे कहा कि आजादी के 70 साल बाद भी हम पिछड़ों को रिजर्वेशन देने से महरूम रहे हैं। 1789 में फ्रांसीसी इंकलाब की बुनियाद भी आजादी और एक दूसरे में बराबरी और भाईचारगी थी क्योंकि यह मजलूमों की बुनियाद थी जिन्हें सताया गया था और गैर बराबरी की समाजी हालात को बयां करता है। उन्होंने कहा कि आजादी के बगैर बराबरी और भाईचारे के बारे में सोचना बेमानी हैं। उन्होंने कहा के भाईचारा आज़ादी और बराबरी उस वक़्त तक मोकम्मल नही है जब तक आपस में एक दूसरे से संबंध न हो। आर्टिकल 14,15, 16 का संबंध भी बराबरी इंसाफ और भाईचारे से है, एक जज के तौर पर मैंने खुद इसका अध्ययन किया है, और ये पाया के इंसान पैदायशी तौर पे बराबर नही है, बराबरी के लिए उसे जद्दोजहद करनी पड़ती है। इस मौके पर IOS के चेयरमैन डॉ मोहम्मद मंजूर आलम ने IOS का परिचय कराते हुए कहा कि IOS  अपने 30 वर्षों के कार्यकाल में बुनियादी मुद्दों पर हमेशा परिचर्चा करता रहा, मगर इस बार हमने बराबरी, भाईचारगी और इंसाफ के विषय को चुना ताकि ये अंदाज़ा लगा सके की हिंदुस्तान में मुसलमान, इसाई, दलित व पिछड़े वर्ग आज कहां खड़ा है। हिंदुस्तान की संविधान के रौशनी में देखा जाये तो उन सबकी हालत अच्छी नहीं है, और संविधान ने उन्हें जो हक दिया है तो वो उन्हें हासिल नही है। प्रोग्राम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ई अहमदी ने कहा कि संविधान वो छत्री है जिसके साए में तमाम मजहब के मानने वाले रहते हैं, यह दुनिया का अकेला मुल्क है जहां तमाम मज़हब के माने वाले प्यार मोहब्बत के साथ रहते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री के रहमान खान ने अपने संबोधन में कहा कि आर्टिकल 14, 15, 16 संविधन की रूह है, और ऐसे हालात में जब समाज में बराबरी न पाई जाए तो इसे यकीनी बनाना मुश्किल काम है, हमे इस बात पर फ़ख़्र है के हमारे मुल्क के संविधान ने एक स्वतंत्र न्यायपालिका दी है ताकि आम लोगों को भी इंसाफ मिल सके। इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ इस्लामिक के जनरल सेक्रेटरी डॉक्टर उमर हसन कसुले ने कहा कि हिंदुस्तान में आज बराबरी इंसाफ आजादी और भाईचारगी पर बहस हो रही है, लेकिन यह विषय सिर्फ हिंदुस्तान का नहीं बल्कि पूरी दुनिया का है। और अब तो पूरी दुनिया में इस पर बहस हो रही है। इंटरनेशनल इस्लामिक चेरिटेबल आर्गेनाइजेशन कुवैत की जनरल सेक्रेटरी ऐ रिफाही ने कहा कि इस्लाम ने इंसान को इज्जत और एहतराम की दौलत से नवाजते हुवे इस पर विशेष ध्यान दिया है। कॉन्फ्रेंस का संचालन प्रोफ़ेसर अफ़ज़ल वाणी ने अंजाम दिया जबकि प्रोफेसर इश्तियाक दानिश आए  हुवे तमाम अतिथियों का धन्यवाद किया। इस मौके पर खालिद सैफुल्लाह रमानी, स्वामी अगनिवेश, डॉ. अब्दुल्ला, अब्दुल हमीद नोमानी आदि मौजूद थे।